Wednesday, 2 April 2014

राहुल ने किया लालू समर्थकों का अपमान

राहुल ने किया लालू समर्थकों का अपमान


कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पहली अप्रैल को बिहार के औरंगाबाद में आयोजित चुनावी सभा में सहयोगी दल राष्‍ट्रीय जनता दल (राजद) के मतदाताओं को अपमानित किया। उन्होंने राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के साथ मंच शेयर करने से तो पहले ही मना कर दिया था, सभा में लालू प्रसाद का नाम तक नहीं लिया।

कांग्रेस बिहार में राजद का आधार वोट पाने की उम्मीद में 12 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन इसके मतदाताओं को तिरस्कृत करती है। राहुल गांधी ने अपनी सभा में राजद प्रत्याशियों का समर्थन करने की कोई अपील भी नहीं की।

राहुल गांधी के इस व्यवहार के बाद राजद के मतदाता उन क्षेत्रों में कांग्रेस का विरोध कर सकते हैं, जहां पार्टी ने गठबंधन के तहत उम्मीदवार उतारे है। औरंगाबाद की सभा से यह भी जाहिर हुआ कि यूपीए ऐसा गठबंधन है, जिसमें सहयोगी दल की कोई इज्जत नहीं।

दूसरी तरफ भाजपा नेतृत्व वाले एन.डी.ए. में शामिल हुए दलों और उनके नेताओं का पूरा सम्मान किया गया। भाजपा के पी.एम. प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी की सासाराम रैली के मंच पर रामविलास पासवान और गया की रैली में उपेन्द्र कुशवाहा उपस्थित थे।

लालू प्रसाद ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की बात का बढ़-चढ़ कर समर्थन किया, लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष ने उनके सम्मान का ध्यान नहीं रखा। इससे राजद के समर्थकों को झटका लगा है। वैसे भी, यह वर्ग परंपरागत रूप से कांग्रेस के विरूद्ध रहा है।

लालू प्रसाद परिवार मोह से लेकर चारा घोटाला तक की कानूनी मजबूरियों में इस तरह घिर गए हैं कि अब उन्हें न गरीबों के अपमान की चिंता है और न वे गरीब के बेटे को पीएम बनाने की बात करते हैं। कांग्रेस से हाथ मिलाकर तो वे एक गरीब परिवार से उभरे नरेन्‍द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का विरोध ही कर रहे हैं।

राजद के मतदाताओं को सोचना चाहिए कि क्या वे अपने नेता और समुदाय को आहत करने वाले राहुल गांधी को पी.एम. बनाना पसंद करेंगे घ् मतदाता के रूप में उन्हें अपना उत्तर वोट के जरिये देना चाहिए।

Tuesday, 1 April 2014

पत्थर नहीं, वोट को बनाएं विरोध का हथियार

पत्थर नहीं, वोट को बनाएं विरोध का हथियार

जिस समय हमलोग लोकनायक जेपी के नेतृत्व में बदलाव के लिए आंदोलन कर रहे थे, उन दिनों प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी के नेता विरोध की हर आवाज के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ बताते थे। जेपी तक को नहीं बक्शा गया। आज बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने विरोध की हर घटना को भाजपा और नरेन्द्र मोदी से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

सोमवार, 31 मार्च, 2014 को नीतीश कुमार ने चार सभाएं की जिसमें उनके गृह जिला नालन्दा के अस्थावां, उनके पुराने संसदीय क्षेत्र के खुसरूपुर तथा शेखपुरा में कुर्सियां चली, पत्थर फेंके गए तथा लाठी चार्ज करना पड़ा। पीएम-पद का सपना देखने वाले व्यक्ति का अपने घर में अपनों के विरोध का सामना करना जनता में बढ़ते असंतोष का साफ संकेत है। विरोध के लिए पत्थरबाजी करना, हंगामा करना और चेहरे पर स्याही फेंकने जैसे तरीके अपनाना लोकतंत्र में सर्वथा निंदनीय है। इसे कोई उचित नहीं ठहरा सकता। लोगों को अपना विरोध लोकसभा चुनाव में सरकार के विरूद्ध मतदान के ज़रिये प्रकट करना चाहिए। इसके आसार भी हैं।

यह सच है कि भाजपा से गठबंधन तोड़ने के बाद नीतीश सरकार में कामकाज ठप पड़ गया है। मुख्यमंत्री जोड़तोड़ में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें जनता से किए गए वादे याद नहीं हैं। जनादेश के साथ विश्‍वासघात हुआ। शासन पर सरकार की पकड़ ढ़ीली पड़ गई है। असंतोष स्वाभाविक है। नीतीश सरकार के कामकाज से संतुष्टि का ग्राफ लगातार गिर रहा है। बिहार के मतदाताओं का मूड जानने के लिए CNN-IBN-LOKNITI-CSDS के ताजा सर्वे में इसका खुलासा हुआ है। 

सर्वे के मुताबिक पिछले तीन महीनों में सरकार से जनता की संतुष्टि‍ का स्तर 52 प्रतिशत से घटकर 32 प्रतिशत रह गया है। यानी, असंतोष में 20 प्रतिशत का इजाफा हुआ। इसी सर्वे के अनुसार प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी को पसंद करने वाले मतदाताओं की संख्या बिहार में पिछले महीने (मार्च, 2014) जहां 42 प्रतिशत पाई गई, वहीं नीतीश कुमार को पसंद करने वालों की संख्या 14 फीसदी से घटकर मात्र 9 फीसद रह गई।

मुख्यमंत्री को सच का सामना करना चाहिए।

किसे पीएम बनाने के लिए वोट मांग रहे हैं नीतीश

किसे पीएम बनाने के लिए वोट मांग रहे हैं नीतीश 

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 14 दलों के साथ मिलकर जो वैकल्पिक मोर्चा बनाया था, वह बनने से पहले ही बिखर चुका है। भाजपा से हाथ छुड़कार नीतीश कुमार जिन दलों का साथ पाने के लिए दिल्ली तक दौड़े थे, वे सब उन्हें अकेला छोड़ गए हैं। बिहार में केवल भाकपा के साथ मात्र दो सीटों पर जद-यू का समझौता हो सका । वामदलों में प्रमुख माकपा ने उनसे हाथ नहीं मिलाया। नीतीश कुमार अपनी बेलगाम महत्वाकांक्षा के चलते अंतत: अकेले रह गए हैं।

शनिवार 29 मार्च के अंक में एक अगेजी दैनिक ने नीतीश कुमार के अलग-थगल पड़ने पर संपादकीय लिखा है। इसमें नीतीश कुमार के लिए ''अप द क्रीक विदाउट ए पैडल'' (संकट में अकेला) जैसे मुहावरे का प्रयोग किया गया है। चुनावी सभाओं में वे सिर्फ भाजपा पर अनर्गल टिप्पणी कर रहे हैं, कांग्रेस पर नहीं। उन्हें घोषणा करनी चाहिए कि वे कांग्रेस और राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार नहीं करेंगे। यदि नीतीश कुमार कांग्रेस के खिलाफ कुछ नहीं कर रहे हैं, तो क्या इसे साठगांठ नहीं माना जाएगा घ् उन्हें जवाब देना चाहिए कि वे किसको प्रधानमंत्री बनवाने के लिए बिहार की जनता से वोट मांग रहे हैं।

भाजपा-विरोध जैसी नकारात्मकता और प्रधानमंत्री बनने की दमित महत्वाकांक्षा रखने वाले 14 नेता चौथा या वैकल्पिक मोर्चा बनाने चले थे। नीतीश कुमार समेत मोर्चे का हर नेता खुद को जोड़-तोड़ से पीएम बनते देखना चाहता था। जल्द ही ऐसे मंसूबे बिखर गए।


तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक की नेता और मुख्यमंत्री जयललिता ने वाम दलों से समझौता किया और चंद रोज बाद उसे तोड़ दिया। उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ सपा ने भी मोर्चे को झटका दे दिया। मुलायम सिंह यादव ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ उम्मीदवार न देने का फैसला सुनाकर गैरकांग्रेसवाद से दूरी बना ली। नीतीश कुमार गैरकांग्रेस-गैरभाजपा दलों का मंच बनाने चले थे, लेकिन वह मंच या तो टूट गया या सिर्फ भाजपा-विरोध तक सिमट गया। नीतीश के सपने हवा हो चुके हैं। राजनीतिक अकेलेपन में वे भाजपा पर अपनी खीझ उतार रहे हैं।

मोदी से घबराहट और हताशा, कांग्रेस की बिगड़ी भाषा

मोदी से घबराहट और हताशा, कांग्रेस की बिगड़ी भाषा

भाजपा सोलहवीं लोक सभा का चुनाव विकास खुशहाली और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे पर लड़ना चाहती है, लेकिन कांग्रेस, जदयू और राजद सोची समझी रणनीति के तहत मुख्य मुद्दे से जनता का ध्यान हटाना चाहती है। सहारणपुर (उत्तर प्रदेश) से कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद का भड़काऊ बयान इसी का नतीजा है। भाजपा के PM प्रत्याशी नरेन्द्र भाई मोदी की हत्या की धमकी देना और निहायत घटिया भाषा का इस्तेमाल करना कांग्रेस के बढ़ती हताशा का सूचक है। कांग्रेस साम्प्रदायिक ध्रुविकरण चाहती है ताकि लोग भ्रष्टाचार, महंगाई और बढ़ती बेरोजगारी जैसे मसलों पर गुस्सा ज़ाहिर करना भूल जायें।

दस साल के कुशासन की वजह से कांग्रेस जनता के बीच कठघरे में खड़ी है, लेकिन बिहार में उसकी हमदर्द पार्टियां (राजद व जदयू) कांग्रेस पर कोई हमला नहीं कर रही हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव भी कांग्रेस की मंशा के अनुरूप साम्प्रदायिक ध्रुविकरण की राजनीति को हवा दे रहे हैं। उनके निशाने पर कांग्रेस नहीं, बल्कि भाजपा और इसके नेता नरेन्द्र मोदी हैं।
यह कितना दु:खद है कि जिस चुनाव में 11 करोड़ युवा मतदाता ''विकसित भारत और मज़बूत भारत'' के सपने सच करने वाली सरकार को चुनना चाहते हैं, उसमें कांग्रेस, राजद और जदयू साम्प्रदायिकता के घिसे-पिटे मुद्दे को उछालना चाहते हैं।

युवा सपनों का साथ देते हुए गत 27 अक्टूबर, 2013 को नरेन्द्र मोदी ने पटना की हुँकार रैली में ज़ाेर देकर कहा था कि गरीब हिन्दू और गरीब मुसलमान को मिलकर गरीबी से लड़ना है, आपस में नहीं। दूसरी तरफ कांग्रेस मोदी लहर से घबराकर समाज को तोड़ने वाले मुद्दे उछालने से बाज़ नहीं आ रही है।

लोकतंत्र में ''मौत का सौदागर'' कहने और ''बोटी बोटी काटने'' जैसी भाषा का इस्तेमाल करने वालों को लोग कभी माफ नहीं करेंगे।

2014 का लोक सभा चुनाव लोकतंत्र को कलंकित करने वालों का भी इतिहास लिखेगा। ऐसे लोग इतिहास के कूड़ेदान में होंगे।

आतंकवाद पर नीतीश का सांप्रदायिक नजरिया

आतंकवाद पर नीतीश का सांप्रदायिक नजरिया

भाजपा पर साम्प्रदायिक चश्मे से आतंकवाद को देखने का मिथ्या आरोप लगाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं आतंकवाद को साम्प्रदायिक और वोट-बैंक की राजनीति के चश्मे से देखते हैं। बोध गया धमाके से पहले खुफिया सूचनाओं की अनदेखी और आतंकी यासीन भटकल की गिरफ्तारी के बावजूद बिहार पुलिस का उससे न पूछताछ करना और न उस पर मुकदमा करना साबित करता है कि नीतीश सरकार आतंकवादी का मज़हब देखकर अपनी प्रति-क्रिया तय करती है, जबकि भाजपा मानती है कि आतंकवादी का कोई धर्म-ईमान नहीं होता है। बिहार सरकार से भाजपा के हटते ही आतंकी घटनाओं में तेजी आना और दरभंगा-मोड्यूल बनाकर आतंकवाद फैलाने वालों का दुस्साहसी होना नीतीश कुमार की सांप्रदायिक राजनीति का ऐसा परिणाम है, जो बिहार के विकास को बाधित कर रहा है। आतंकियों से जुड़ी इशरत जहां को बिहार की बेटी बताना इसी वोट-बैंक की राजनीति का हिस्सा है। समस्तीपुर में आतंकी शाहीन अख्तर के चाचा के पक्ष में खड़ा दिखने वाले जद-यू के नेताओं ने बिहार को विकास के रास्ते से भटका कर इसे आतंकियों के अभयारण्य में बदलने का काम किया है। 

नीतीश कुमार आतंकवाद को आतंकियों के नजरिए से देखते हैं। भाजपा आतंकवाद को वोट या संप्रदाय की नजर से नहीं, बल्कि देशहित की दृष्टि से देखती है। नीतीश कुमार आतंकवादियों को धार्मिक योद्धा (जेहादी) भी कह दे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। जिस कांग्रेस से उनकी हमदर्दी है, उसके नेता पहले ही आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन के लिए आदरसूचक शब्द का उपयोग कर चुके हैं, अब नीतीश कुमार भी 'भटकल जी' '’शाहाीन अख्तर जी' जैसे शब्द चुन सकते हैं। भाजपा का स्पष्ट मत है कि आतंकवाद का न हरा रंग होता है और न ही भगवा। आतंकवादी न हिन्दु होता है न मुसलमान, वह केवल आतंकवादी होता है।