Thursday, 1 May 2014

फारूक, लालू और मुख्तार धर्मनिरपेक्षता के लिए खतरा

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के इशारे पर देश की धर्मनिरपेक्ष निर्वाचन व्यवस्था पर लगातार हमले किये जा रहे हैं। दिल्ली के शाही इमाम, केन्द्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला, पूर्व मंत्री लालू प्रसाद, बाहुबली मुख्तार अंसारी, अख्तरूल ईमान और शाजिया इल्मी जैसे नेता सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति से देश को बांटने की साजिश कर रहे हैं। इसके चलते धार्मिक आधार पर अलग निर्वाचन क्षेत्र की बिटि’कालाीन व्यवस्था के लौटने का खतरा पैदा हो गया है।

महात्मागांधी की पहल से 1905 में पृथक निर्वाचन क्षेत्र की वह व्यवस्था खत्म की गई थी, जिसमें हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग मतदान करते थे। 99 साल बाद चुनाव प्रणाली को उसी दौर में ले जाने की नापाक कोशिश हो रही है, जबकि भाजपा के पीएम-प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी धुवीकरण की राजनीति का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने हमेशा सवा करोड़ लोगों के विकास की बात की है।

चुनाव प्रचार के दौरान सोनिया गांधी ने शाही इमाम से मिलकर धार्मिक आधार पर मतदान की अपील जारी कराई। फिर कांग्रेस ने धार्मिक आधार पर आरक्षण देने का वादा किया। कि’नागंज में अख्तरूल ईमान और वाराणसी में मुख्तार अंसारी ने वोटरों को सांप्रदायिक सोच के साथ एकजुट करने की अपील की। शाजिया इल्मी ने एक वर्ग को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए उकसाया। 

फारूक अब्दुल्ला और लालू प्रसाद सांप्रदायिकता की इसी राजनीति को धर्मनिरपेक्षता का लेबुल लगाकर बेच रहे हैं। कट्टरता बढ़नो के लिए कसाई, जल्लाद और समंदर में फेंकने जैसे शब्द इस्तेमाल किये जा रहे हैं। सीमा के भीतर से फारूक क’मीर को अलग करने की धमकी दे रहे हैं। सीमापार से पाकिस्तान के गृहमंत्री चौधरी निसार अली खान भारत को दाउद के मुद्दे पर आंखे दिखा रहे हैं। चौधरी निसार भारत के घरेलू मामले में हस्तक्षेप करते हुए नरेन्द्र मोदी पर टिप्पणी कर रहे हैं। भारत के भीतर और बाहर की विभाजनकारी ताकतों पर कारगर शिकंजा कसने के लिए दिल्ली में पूर्ण बहुमत वाली नमो-सरकार बनाना जरूरी है। इस नजरिये से देखें तो 16वीं लोकसभा का चुनाव साधारण चुनाव नहीं, भारत का भविष्य तय करने वाला है।

Wednesday, 30 April 2014

गठबंधन तोड़ने के गुनहगार नीतीश मांग रहे 'मजदूरी'

उस मजदूर को क्या कहेंगे, जो दोस्त के साथ मिलकर मजदूरी-किसानी करे, लेकिन पूरे काम की दिहाड़ी अकेले ही मांगने लगे? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कुछ इसी तरह जनता से अपने काम के बदले वोट मांग रहे हैं। बिहार के मतदाताओं ने 2005 में भाजपा-जदयू गठबंधन (एन.डी.ए.) को 15 साल का जंगल राज खत्म कर विकास करने के लिए सत्ता सौंपी थी। जनादेश के अनुसार दोनों दलों ने मिलकर काम किया। पांच साल में हर तरफ बदलाव नजर आने लगा।

2010 के विधान सभा चुनाव में जब दोनों दलों के गठबंधन ने अपने काम की मजदूरी मांगी, तो जनता ने तीन चौथाई बहुमत दिया। उम्मीद से ज्यादा मजदूरी मिली। एन.डी.ए-2 ने और उत्साह से काम को आगे भी बढ़याा, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की निजी महत्वाकांक्षा अचानक बिहार के हितों से ज्यादा बड़ी हो गई। उन्होंने मिलकर काम करने के जनादेश का अपमान किया। गठबंधन तोड़ दिया गया। धर्मनिरपेक्षता को भाजपा से अलग होने का बहाना बनाया गया। विकास रूक गया।

लोकसभा का चुनाव केंद्र की भ्रष्ट और नकारा यूपीए सरकार से जनता को मुक्ति दिलाने के लिए है। यह युवाओं को रोजगार और देश को मजबूत नेतृत्व देने का अवसर है, लेकिन नीतीश कुमार और लालू प्रसाद इसे मुख्य मकसद से भटकाने में लगे हैं। लोकसभा चुनाव में राज्य सरकार के काम पर वोट मांगना और सांप्रदायिकता के मुद्दे को तूल देना कांग्रेस की मदद करने की साजिश है। मुख्यमंत्री को गठबंधन तोड़ने और राष्ट्रीय मुद्दों से ध्यान बंटाने की सजा मिलनी चाहिए या आधे काम की मजदूरी? मतदाता ही इसका सही जवाब देंगे।

Tuesday, 29 April 2014

जनता के भरोसे का इम्तिहान ले रहे नीतीश कुमार

(सिद्धांत नहीं, सुविधा के लिए तोड़ा गठबंधन)

अगर कोई शख्स दो खण्डों में कुल 30 साल किसी के साथ चले और फिर अपनी अवसरवादी महत्वाकांक्षा के चलते रिश्ता तोड़ दे, तो उस पर लोग कितना यकीन करेंगे? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भाजपा से नाता तोड़ने को 'सिद्धांत की राजनीति' बताकर जनता के यकीन का इम्तिहान ले रहे हैं। अहंकार और सुविधा की राजनीति को सिद्धांत का चोला पहनाया जा रहा है।

1967 में बिहार की पहली गैर कांग्रेसी सरकार में कपूर्री ठाकुर और रामानन्द तिवारी थे। कम्यूनिस्ट भी थे। 1974 के जे.पी. आन्दोलन और उसके बाद 1977 में केन्द्र तथा बिहार में जनता पार्टी की सरकारें बनीं। उस दौर में नीतीश  कुमार जनसंघ के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे। तब जनसंघ उनके लिए साम्प्रदायिक नहीं था। अचानक 13 साल बाद 1980 में जनसंघ 'साम्प्रदायिक' हो गया। दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जनता पार्टी टूट गई। सत्ता में कांग्रेस की वापसी का मार्ग प्रशस्त कर दिया गया। 

नीतीश कुमार 1967 से 1980 तक अपनी राजनीति के प्रारंभिक वर्षों में संघ-जनसंघ की विचारधारा के लोगों के साथ मिलकर काम करते रहे। तब सांप्रदायिकता कोई मुद्दा नहीं था। नीतीश कुमार 16 साल तक भाजपा से दूर रहे परन्तु 1996 में यही पार्टी उन्हें फिर धर्मनिरपेक्ष लगने लगी। वे 2013 तक पूरे 17 साल भाजपा के साथ रहे। भाजपा की वजह से रेल मंत्री बने और फिर मुख्यमंत्री भी बने। उस समय भाजपा 'साम्प्रदायिक' नहीं थी।

मुख्यमंत्री के रूप में वे विकास और सुशासान का सारा श्रेय खुद लेने लग गए। पीएम बनने की महत्वाकांक्षा हावी होने लगी, तो भाजपा को सांप्रदायिक बताने लगे। गठबंधन तोड़कर उन्होंने फिर बिहार को 2005 जैसे हालात में ला दिया है। नीतीश कुमार 17 साल बाद भाजपा की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठा रहे हैं। बिहार के जागरूक मतदाता कांग्रेस और राजद की मदद करने वाली इस साजिश को समझ चुके हैं।

Monday, 28 April 2014

झूठे वादे से मासूम बिहारियों का दिल न दुखाइये


झूठे वादे से मासूम बिहारियों का दिल न दुखाइये

बिहार को रेल जैसा दौड़ायेंगे, दे रहे ये ऐसी पुकार,
10 साल जब राज किया, तो देखा सबने बिहार में ‘चमत्‍कार’,
केवल किया इन्‍होंने तिजोरियों को आर पार,
फिर 8 साल लगाए इन्‍होंने कोर्ट के चक्‍कर चार,
और हाल तक जेल में खा रहे थे मक्खियों से मार,

अब कह रहे, मौका दो तो फिर करेंगे बिहार का श्रृंगार I


नरेन्‍द्र मोदी आ गए तो बदल देंगे अपना नाम,
पर हम बिहारियों की क्‍या गलती, 

क्‍यों पूरे देश में किया बिहारियों को आपने बदनाम,

सारे बिहारी कर रहे दिल और दिमाग से हर जगह काम,
फिर बेइज्‍जत होंगे हम सब, अगर इनके जैसों ने संभाली कमान I

मजाक करना पसंद है, तो अपना मजाक बनाते रहिए,

आंख बंद कर सपने देखना पसंद है, तो खुद को सपने दिखाइए,

परिवारवाद में भरोसा है, तो उन्‍हें भी आगे बढ़ाइये,

पर बिहार को चमकाने का वादा, ऐसे झूठ से, 

मासूम बिहारियों का दिल न दुखाइये I

Sunday, 27 April 2014

लालटेन में तेल खत्‍म

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लालटेन में तेल खत्‍म


खत्म हो रहा लालटेन में तेल,
तभी हो रहा जद(यू) से काफी सीटों पर मेल,
जद(यू) की तरह आप चला रहे बिना पहिये की रेल,
उन्हीं की तरह देखना आप भी होंगे फेल।
बहुत खाया इन्होंने बिहार का चारा,
भूल गए जनता ने इन्हें कितनी बार नकारा,
अब तो आप बन सकते हैं केवल कांग्रेस की ही आँखों का तारा,
गली गली में शोर है..., भूली नही जनता ये नारा।
इस चुनाव में जनता को कैसे बेवकूफ बनाओगे?
वोट पाने के लिए कौनसा नया करतब दिखलाओगे?
कांग्रेस को पकड़े रखना, फिर भी मात खाओगे,
लाख कोशिश कर लो, मोदी की हवा में बह जाओगे।

Saturday, 26 April 2014

नीतीश राज में बदहाल हुई कानून-व्यवस्था


(सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी, महिलाएं और असुरक्षित)

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 25 अप्रैल को टिप्पणी की कि बिहार में कानून-व्यवस्था दयनीय स्तर पर है। न्यायालय ने राज्य सरकार के पुलिए महानिदेशक से पूछा है कि बलात्कार का आरोपी खुला कैसे घूम रहा है? अदालत की इस टिप्पणी और कानून-व्यवस्था की बदहाली के लिए सीधे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिम्मेवार हैं। उन्हाेंने भाजपा से नाता तोड़कर बिहार को फिर से अराजकता के दौर में पहुंचा दिया है।

जब तक भाजपा बिहार सरकार में शामिल थी, तब-तक सुशासन सरकार की यूएसपी (खासियत) थी। प्रदेश में भयमुक्त वातावरण बना रहा। निवेशक उद्योग-व्यापार में रूचि लेने लगे थे, लेकिन नीतीश कुमार ने अहंकार के चलते गठबंधन तोड़ा और हालात लगातार बिगड़ते चले गए। उग्रवादी हिंसा और आतंकी धमाके तो बढ़े ही, हत्या-बलात्कार की घटनाएं भी बढ़ने लगीं।

बिहार पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि 2007 में 2963 हत्याएं हुईं, जबकि भाजपा के सरकार से हटने के बाद 2013 में 3441 लोग हत्या के शिकार हुए। शासन की कमजोरी के चलते जो 478 अधिक बिहारी अपने ही राज्य में मारे गए, उसके लिए जिम्मेवार कौन है? मुख्यमंत्री बताएं कि हत्या के आंकड़े घटने की बजाए 478 बढ़ क्यों गये? राज्य को महिलाओं के लिए अधिक भयावह क्यों बना दिया गया? 2010 में बलात्कार की घटनाएं 795 दर्ज की गईं, लेकिन 2013 में बलात्कार की घटनाएं 1128 तक पहुंच गईं। पहले की अपेक्षा 333 अधिक महिलाएं बलात्कार का शिकार बनीं। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी बलात्कार की घटना के संदर्भ में हैं।

अपराध की ये घटनाएं नीतीश कुमार की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते टूटे गठबंधन और कमजोर सरकार के कारण बढ़ी है। भाजपा बिहार को कुशासन के पुराने दौर में लौटने नहीं देगी। पार्टी का संघर्ष नीतीश कुमार और लालू प्रसाद दोनों से है।

Friday, 25 April 2014

लालू प्रसाद अब तक क्यों नहीं लगवा सके आर.एस.एस. पर प्रतिबंध?

(सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत का कर रहे हैं दुरूपयोग)

चारा घोटाले में सजायाफता लालू प्रसाद यूपीए-1 में मंत्री रहे और कांग्रेस में मिले तिरस्कार के बावजूद यूपीए-2 का समर्थन करते रहे। केंन्द्र की सत्ता के साथ रहते हुए विगत दस साल में भी वे आर.एस.एस. (राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ) पर रोक क्यों नहीं लगवा सके? अब चुनाव के समय वे एक देशभक्‍त संगठन को बदनाम कर रहे हैं। कांग्रेस के कुशासान और भ्रष्टाचार के प्रति गुस्से से ध्यान बंटाकर मतदाताओं के एक वर्ग को वोट-बैंक में बदलने के लिए भाजपा और संघ का डर पैदा किया जा रहा है।

लालू प्रसाद बार-बार कह रहे हैं कि यूपीए सत्ता में आया तो आर.एस.एस. पर प्रतिबंध लगाया जाएगा और गुजरात दंगे की जांच फिर से कराई जाएगी। सवाल यह है कि यूपीए सरकार 10 साल में ऐसा क्यों नहीं कर सकी? लालू प्रसाद चारा घोटाला में दोषी पाये जाने के चलते मुखिया और पार्षद तक का चुनाव लड़ने के लायक नहीं हैं लेकिन ध्रुवीकरण की राजनीति के चलते संघ पर रोक लगाने की बात कर रहे हैं। 

आजाद भारत में सबसे ज्यादा दंगे कांग्रेस शासन में हुए। भागलपुर का दंगा भी कांग्रेस शासन में हुआ। यूपीए के इस दाग को छिपाने के लिए सिर्फ गुजरात के दंगे की दुराग्रहपूर्ण चर्चा की जाती है। गुजरात दंगों के मामले में न्यायालय के क्लीन चिट के बावजूद चारा घोटले में सजायाफ्ता और जमानत पर छूटे लालू प्रसाद गुजरात दंगे संबंधी न्यायिक फैसले पर सवाल उठाकर अदालत का अपमान कर रहे हैं। समाज के जख्म हरे रखना और राजनीतिक फायदे के लिए न्यायालय के फैलसे पर सवाल उठाना क्या अदालत का अपमान नहीं है? अगर अपराधी चुनाव नहीं लड़ सकता, तो क्या जमानत की अवधि में उसे चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की इजाजत मिलनी चाहिए? क्या इस पर चुनाव आयोग को संज्ञान नहीं लेना चाहिए? इन बडे़ सवालों का जवाब जनता अपने भारी मतदान से ही दे सकती है।