कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के इशारे पर देश की धर्मनिरपेक्ष निर्वाचन व्यवस्था पर लगातार हमले किये जा रहे हैं। दिल्ली के शाही इमाम, केन्द्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला, पूर्व मंत्री लालू प्रसाद, बाहुबली मुख्तार अंसारी, अख्तरूल ईमान और शाजिया इल्मी जैसे नेता सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति से देश को बांटने की साजिश कर रहे हैं। इसके चलते धार्मिक आधार पर अलग निर्वाचन क्षेत्र की बिटि’कालाीन व्यवस्था के लौटने का खतरा पैदा हो गया है।
महात्मागांधी की पहल से 1905 में पृथक निर्वाचन क्षेत्र की वह व्यवस्था खत्म की गई थी, जिसमें हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग मतदान करते थे। 99 साल बाद चुनाव प्रणाली को उसी दौर में ले जाने की नापाक कोशिश हो रही है, जबकि भाजपा के पीएम-प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी धुवीकरण की राजनीति का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने हमेशा सवा करोड़ लोगों के विकास की बात की है।
चुनाव प्रचार के दौरान सोनिया गांधी ने शाही इमाम से मिलकर धार्मिक आधार पर मतदान की अपील जारी कराई। फिर कांग्रेस ने धार्मिक आधार पर आरक्षण देने का वादा किया। कि’नागंज में अख्तरूल ईमान और वाराणसी में मुख्तार अंसारी ने वोटरों को सांप्रदायिक सोच के साथ एकजुट करने की अपील की। शाजिया इल्मी ने एक वर्ग को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए उकसाया।
फारूक अब्दुल्ला और लालू प्रसाद सांप्रदायिकता की इसी राजनीति को धर्मनिरपेक्षता का लेबुल लगाकर बेच रहे हैं। कट्टरता बढ़नो के लिए कसाई, जल्लाद और समंदर में फेंकने जैसे शब्द इस्तेमाल किये जा रहे हैं। सीमा के भीतर से फारूक क’मीर को अलग करने की धमकी दे रहे हैं। सीमापार से पाकिस्तान के गृहमंत्री चौधरी निसार अली खान भारत को दाउद के मुद्दे पर आंखे दिखा रहे हैं। चौधरी निसार भारत के घरेलू मामले में हस्तक्षेप करते हुए नरेन्द्र मोदी पर टिप्पणी कर रहे हैं। भारत के भीतर और बाहर की विभाजनकारी ताकतों पर कारगर शिकंजा कसने के लिए दिल्ली में पूर्ण बहुमत वाली नमो-सरकार बनाना जरूरी है। इस नजरिये से देखें तो 16वीं लोकसभा का चुनाव साधारण चुनाव नहीं, भारत का भविष्य तय करने वाला है।







